ISRAIL IRAN WAR इजराइल ईरान जंग भारत की टेंशन क्या थर्ड वर्ल्ड वॉर का बड़ा खतरा
इजराइल और ईरान में पिछले कुछ दिनों से चल रही युद्ध की धमकी अब सही साबित होती जा रही है। ईरान ने इसराइल पर हमला कर दिया है जिसका जवाब देने को इजराइल तैयार हो रहा है। क्या है इस युद्ध की वजह और क्या पड़ेगा इसका भारत पर असर आज की इस खबर पर रखते है एक सरसरी निगाह।
ईरान ने इजराइल पर क्यों किया हमला तात्कालिक कारण
सीरिया की राजधानी दमिश्क में ईरान के दूतावास में हमला होने से उसके एक वरिष्ठ कमांडर के साथ कुल 13 लोगो की मौत हो जाने से ईरान बौखलाया हुआ है उसका कहना है कि ये इसराइल ने किया है। ईरान ने इसके लिए इसराइल को चेतवानी दी और कहा कि इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। हालाँकि इजराइल ने इस हमले की कोई जिम्मेदारी नहीं ली है न ही इसका खंडन किया है और ईरान को आगाह करते हुए कहा कि अगर ईरान उस पर हमला करेगा तो जैसे को तैसा जवाब दिया जायेगा।

इजराइल का निर्माण मिडिल ईस्ट में तनाव का दौर
ईरान और इजराइल के बीच विवाद का क्या कारण रहा है इसके लिए इतिहास के पन्नो को पलटने से चीजे साफ होंगी। तो चलते है द्वितीय विश्व युद्ध के ख़तम होने के समय पर जब मित्र देशो ने युद्ध जीत लिया और फिलिस्तीन के एक हिस्से पर यहूदी समुदाय के लोगो को बसाया। इससे पहले यहूदियों का कोई अपना देश नहीं था और वे दुनिया के अलग अलग जगह पर रहते थे I हालाँकि माना जाता है कि शुरू में यहूदियों के पूर्वज फिलिस्तीन वाले क्षेत्र में ही निवास करते थे लेकिन बाद में जब यहूदियों के प्रति एक घृणा का दौर चला तो उन पर काफी अतयाचार हुआ जिसमे सबके नजदीक समय में जर्मन तानाशाह हिटलर के द्वारा यहूदियों का नरसंहार था। जिससे दुनिया के अलग अलग जगहों पर वे लोग रहने को मजबूर हो गए थे। चलो वापस आते है यहूदी समुदाय के फिलिस्तीन में बसने के समय पर। जैसे ही इस क्षेत्र पर इजराइल का निर्माण 1948 में हुआ तब उसके चारो और मुस्लिम कन्ट्रीज ने इसे देश के रूप में मान्यता देने से इंकार कर दिया था इजराइल चारो तरफ से मुस्लिम देशो से घिरा था। जिसमे फिलिस्तीन , लेबनान ,सीरिया, ,सऊदी अरब, यमन प्रमुख थे इन सबने मिलकर इसराइल पर हमला कर दिया मगर इजराइल ने सबको हराकर युद्ध जीता और फिलिस्तान के काफी क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। फिलिस्तीनियों को मजबूरन जगह छोड़नी पड़ी और शरणारीथियो की तरह लेबनान में वे बस गए।
ईरान और इजराइल की शुरुवाती दोस्ती
ईरान जो एक बड़ा मुस्लिम देश था वो युद्ध में शामिल नहीं था उस दौर में ईरान में राजशाही थी और वहा का राजा अमेरिका के इशारो पर चलता था 1978 तक ईरान और इसराइल अच्छे मित्र रहे । इसराइल ईरान को टेक्नोलॉजी शेयर करता तो वही ईरान भी तेल और गैस बदले में इसराइल को निर्यात करता था। 1978 के बाद जब राजशाही का अंत कर ईरान में अयातोल्लाह रूहुल्लाह खोमैनी ने इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना की।

दोस्ती बदली कड़वाहट में
अयातोल्लाह रूहुल्लाह खोमैनी अमेरिका और इजराइल से नफरत करते थे और अमेरिका को बड़ा शैतान और इजराइल को छोटा शैतान बताते , इसकी वजह फिलिस्तीन में इजराइल का बढ़ता क्षेत्र था। फिलिस्तीन के नागरिक शरणार्थी के रूप में रह रहे थे जिसका ईरान विरोध करने लगा। सभी मुस्लिम देशो को एकत्र कर के इजराइल का विरोध करना शुरू किया। इसराइल ने इस पर ज्यादा प्रतिकिर्या नहीं दी वैसे रोचक बात यह है कि इसी दौरान इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन जो ईरानी तख्तापलट के कारण ईरान का दुश्मन हो गया था ने ईरान पर जब हमला किया तब इजराइल ने ईरान का साथ दिया था ,खैर उस पर चर्चा किसी अन्य आर्टिकल में करेंगे।
इजराइल के दुश्मन संगठनों को मिली ईरानी मदद
1989 में अली खामिनी ईरान के नए लीडर बने ये ईरान को मुस्लिम जगत का सबसे बड़ा नेता बनाना चाहते थे और इसके लिए वो सभी मुस्लिम देशो को इकठ्ठा करना शुरू किया , फिलिस्तनियो शरणार्थियों जो जॉर्डन सीरिया और लेबनॉन में रह रहे थे उन सबको मदद देकर एक संगठन हिज्बुल्ला के निर्माण में अपना योगदान देना शुरू किया और इसी तरह गाजा में एक संगठन हमास को भी ईरान मदद करता रहा इसके अलावा यमन के हूती विद्रोहियों को भी ईरान ने सपोर्ट किया और इस तरह इजराइल को घेरना शुरू किया जिसमे इजराइल उलझता रहा।

ईरान बनना चाहता है परमाणु शक्ति मगर उसके साइंटिस्ट की रहस्मयी मौतो का क्या है कारण
ईरान हिज्बुल्ला हमास और हूती विद्रोहियों को मदद देकर इसराइल को परेशान करता है लेकिन वो सीधे युद्ध में जाने से बचता है इसका बड़ा कारण इसराइल का परमाणु संपन्न राष्ट्र होना है। ईरान भी पिछले एक दशक से परमाणु बम बनाने का काफी प्रयास कर रहा है जिसमे नार्थ कोरिआ चीन और अब रूस मदद कर रहा मगर इसराइल अमेरिका की सहायता से ईरान के परमाणु वैज्ञानिको को मरवा देता है अब तक 7 से ज्यादा महचपूर्ण ईरानी परमाणु वैज्ञानिको की रहस्मय ढंग से मृत्यु हो चुकी है ,जिसमे इसराइल का ही हाथ बताया जाता है इसके अलावा इसराइल ईरान के परमाणु ठिकानो पर ड्रोन हमला करता रहता है I असल में अमेरिका और इसराइल मिडिल ईस्ट के किसी अन्य देश को परमाणु संपन्न नहीं बनने देना चाहते क्युकी इससे उनका मिडिल ईस्ट में प्रभाव खतम हो जायेगा और यहाँ के खनिज संपन्न देशो का वो दोहन नहीं कर पाएंगे।

दूतावास में हमला बढ़ता तनाव
जब भी दोनों के बीच में टेंशन होती है तो दोनों देश एक दूसरे के विभिन्न देशो में स्थित दूतावासों पर भी हमला करते रहते है चाहे कुछ सालो पहले दिल्ली में इसराइल के दूतावास पर हुआ हमला और अब हाल में सीरिया में हुआ ईरानी दूतावास में हुआ हमला दोनों देश एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते है।
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अमेरिका का क्या है रुख
अमेरिका को इसराइल का समर्थक माना जाता है और ईरान का विरोधी। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इसराइल को सावधान करते हुए उसके साथ हर हाल में खड़े रहने के अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है। ईरान के करीबी देशो से अमेरिका बात भी कर रहा और युद्ध न करने के नसीहत दे रहा है ,साथ ही अमेरिका ने अपने नागरिको के लिए एडवाइजरी जारी की है अमेरिका के साथ ब्रिटैन फ्रांस आदि देशो ने भी अपने नागरिको को इस्राइल, ईरान, फलीस्तीन पर ट्रेवल करने से मना किया है।
भारत की चिंता
ईरान के साथ भारत के सांस्कृतिक तौर पर पुराने सम्बन्ध है एक पर्शियन सभ्यता का प्रमुख है तो दूसरा इंडस सभ्यता का जनक। ईरान तेल इन सबके अतिरिक्त भारत से काफी लोग ईरान में काम भी करते है भारत ने इस तनाव पर चिंता जाहिर की है अगर युद्ध हुआ तो इस पूरी क्षेत्र में काफी नुकसान होगा साथ ही तेल के दामो में काफी बढ़ोतरी हो जाएगी।
इस समय मिडिल ईस्ट एक बारूद का ढेर बना हुआ है जिस पर एक चिंगारी भयानक आग का रूप ले लेगी आशा करते करते है की तनाव का दौर खतम हो और दुनिया में शांति बनी रहे।
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